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देखो भाई एक अनोखी रेल आई
Written by SANJAY KUMAR FARWAHA   
Sunday, 14 November 2010 18:48
SANJAY KUMAR FARWAHA

 

 

मेरा जन्म नंगल में हुआ । इस लीये मुझे जहाँ की हर एक चीज अच्छी लगती है । मैं बचपन से ही नंगल से भाखड़ा जाने वाली रेलगाड़ी को देखता आया हूँ । इस रेलगाड़ी के प्रति अपने मनं की भावनाओं को मैं ईस कविता के माध्यम से आप तक पहुंचा रहा हूँ ।


देखो भाई एक अनोखी रेल आई

जिसने नंगल टाउनशिप से भाखड़ा तक

मुसाफिरों को मुफ्त की सैर करवाई

देखो भाई एक अनोखी रेल आई

 

ना किसी ने टी. टी. को टिकेट दीखाई , ना ही गार्ड ने सिटी बजाई

ना ही कीसी ने स्टेशन पर गाड़ी के आने जाने की घोषणा कवाई

देखो भाई एक अनोखी रेल आई

जीसने नंगल टाउनशिप से भाखड़ा तक

मुसाफिरों को मुफ्त की सैर करवाई

देखो भाई एक अनोखी रेल आई



नंगल और भाखडा के साथ लगते जीतने भी हैं गाँव

उन सब में रहने वाले लोगों के आती प्रतिदिन यह काम

कोई बाजार जाने को चढ़ जाए

तो किसी को सुंदर दृशय लुभाएँ

देखो तो बूढी मेरी अम्मा

लीये हाथ में थेला और डंडा

जरा भी ईस में ना घबराई

ख़त्म कर सब काम यह अपने

वापिस ओलिंडा लोट आई

देखो भाई एक अनोखी रेल आई

जिसने नंगल टाउनशिप से भाखड़ा तक

मुसाफिरों को मुफ्त की सैर करवाई

देखो भाई एक अनोखी रेल आई



पहले सुबह सात बजे फीर दोपहर तीन बजे यह चलने का हार्न बजाये

फीर नंगल से भाखडा तक बी.बी.एम .बी. के करमचारियो को काम पर ले जाये

नंगल से धीरे धीरी यह चलाकर लेबर हट तक जाये,

फीर दुबेटा ,गवाल्थई से गुजरकर सब को ओलिंडा पहुँचाए

तैयार हो जाओ भाखड़ा वालों

अब अंतिम स्टेशन भाखड़ा पर

उतारने की तुम्हारी बारी आई

देखो भाई एक अनोखी रेल आई

जिसने नंगल टाउनशिप से भाखड़ा तक

मुसाफिरों को मुफ्त की सैर करवाई

देखो भाई एक अनोखी रेल आई

 

कई तरहां के डिब्बे इसमें प्रबंधकों ने है लगवाए

किसी को कीर्तन भजन मंडली का

तो किसी को साधारण डीब्बा ही भाए

प्रबंधकों तो महिलाओं को इस में

अलग डिब्बे की सुविधा हें दीलवाई

देखो भाई एक अनोखी रेल आई

जीसने नंगल टाउनशिप से भाखड़ा तक

मुसाफिरों को मुफ्त की सैर करवाई

देखो भाई एक अनोखी रेल आई



बलखाती मस्ती में यह तो पटरी पर दौड़ी जाये

ड्राईवर भी हर क्रासिन्ग पर जोर जोर से हार्न बजाये

सतलुज के किनारे चलते चलते यह

मुसाफिरों को नंगल के मनमोहक दृशय दिखलाए

नंगल से भाखड़ा के रास्ते में एक सुरंग भी है भाई

देखो भाई एक अनोखी रेल आई

जीसने नंगल में अपनी एक अलग पहचान हें बनाई

देखो भाई एक अनोखी रेल आई

जिसने नंगल टाउनशिप से भाखड़ा तक

मुसाफिरों को मुफ्त की सैर करवाई

देखो भाई एक अनोखी रेल आई


( संजय कुमार फर्वाहा )

 


Last Updated on Tuesday, 16 November 2010 11:52
 

Comments  

 
#2 Administrator 2010-11-15 22:12
Sanjay ji great well done a great poetry
 
 
#1 SSCHUG 2010-11-15 10:23
Bahut Badia, Sanjay ji. Keep it up.
 

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