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Poem by our Gem Sanjay Kumar
Written by SSCHUG   
Tuesday, 02 November 2010 10:29
SSCHUG आजकल हर चीज बहुत महंगी है , यह कविता एक पिता की भावनाओं को वयक्त करती है
जिन के पास पेसे कम हैं



महँगी हुई दीवाली
अब पापा क्या करें
पापा की जेब है खाली
अब पापा क्या करें
महँगी हुई दीवाली
अब पापा क्या करें
पापा की जेब है खाली
अब पापा क्या करें

चुन्नू को चाहिए महँगी फुलझरियां
मुन्नू को महँगे बम,पटाके
इन पर पैसे खर्च दिए तो
घर में पड़ जाएँगे फाके

अब पापा क्या करें
महँगी हुई दीवाली
अब पापा क्या करें
पापा की जेब है खाली
अब पापा क्या करें

पत्नी को चाहीय महँगी साड़ी
बीन साड़ी नहीं चलेगी ग्रहस्ती की गाड़ी

बीन साड़ी पत्नी ना माने
कहती है मत बनाओ महंगाई के बहाने
साड़ी नहीं मीली तो चली जायेगी माइके
अब पापा क्या कर
महँगी हुई दीवाली
अब पापा क्या करें
पापा की जेब है खाली
अब पापा क्या करें

आलू,पुड़ी, खीर , कचोडी
महगाई ने कमर है तोड़ी

मेवा फल मीठे पकवान
महंगाई ने भुला दिए हैं इन के नाम
कैसे लाऊँ मैं यह सब घर पर अपने
महंगाई खड़ी है घर दवार पे मेरे
जैसे लठ लीए कोई दरवान
अब पापा क्या करैं
महँगी हुई दिवाली
अब पापा क्या करें
पापा की जेब है खाली
अब पापा क्या कारें

की है सिर्फ घर की सफाई
महंगाई ने छीन ली है पुताई
सजा ना पाऊं घर को में अपने
धरे रह गए मनं के सब सपने
बस काम चला रहा हूँ
घर के दवार पे में अपने
बस बांध शुभ दीवाली का बन्दनवार
अब पापा क्या करे
महँगी हुई दीवाली
अब पापा क्या करें
पापा की जेब है खाली
अब पापा क्या करें

संजय कुमार फरवाहा

Last Updated on Tuesday, 02 November 2010 15:46
 
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